सोमवार, 24 जुलाई 2017

भागवत पुराण स्फुट - 2 [अध्याय 3.20, स्वयंभू द्वारा सृष्टि], तदा मनून् ससर्जान्ते मनसा लोकभावनान्

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सोऽनुविष्टो भगवता यः शेते सलिलाशये ।
लोकसंस्थां यथा पूर्वं निर्ममे संस्थया स्वया ॥ ०३.२०.०१७ ॥
ससर्ज च्छाययाविद्यां पञ्चपर्वाणमग्रतः ।
तामिस्रमन्धतामिस्रं तमो मोहो महातमः ॥ ०३.२०.०१८ ॥
विससर्जात्मनः कायं नाभिनन्दंस्तमोमयम् ।
जगृहुर्यक्षरक्षांसि रात्रिं क्षुत्तृट्समुद्भवाम् ॥ ०३.२०.०१९ ॥
क्षुत्तृड्भ्यामुपसृष्टास्ते तं जग्धुमभिदुद्रुवुः ।
मा रक्षतैनं जक्षध्वमित्यूचुः क्षुत्तृडर्दिताः ॥ ०३.२०.०२० ॥
देवस्तानाह संविग्नो मा मां जक्षत रक्षत ।
अहो मे यक्षरक्षांसि प्रजा यूयं बभूविथ ॥ ०३.२०.०२१ ॥
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स्वयं से उत्पन्न स्वयंभू में भगवान आविष्ट हुये और उनके ऐसा करने पर सृष्टि का निर्माण आरम्भ हुआ। भागवत कार 'भगवता' शब्द का प्रयोग करते हैं जोकि बौद्ध परम्परा में भी खूब प्रयुक्त हुआ है। लिखते हैं - यथा पूर्वं निर्ममे संस्थया स्वया, पूर्वकाल में स्वयं द्वारा संस्थाओं के अनुकरण में (पुन:) लोकसंस्था (सृष्टि) रचने लगे।
सृष्टि के चक्रीय क्रम को पूर्व शब्द द्वारा संकेतित किया गया है। 'संस्था' और 'लोकसंस्था' शब्द प्रयोगों पर ध्यान दीजिये कि अर्थ कितने परिवर्तित हो गये हैं!
यदि आप संस्कृत मूल नहीं पढ़ेंगे तो शब्दों की इस यात्रा से अपरिचित रह जायेंगे और अंतत: म्लेच्छ प्रतिपादित रूढ़ अर्थों के दास बन कर रह जायेंगे। इसलिये [संस्कृत पढ़िये]।
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आगे जो हुआ उसे पढ़ते ही ऋग्वेद का नासदीय सूक्त मन में उठने लगता है:
न मृत्युरासीदमृतं न तर्हि न रात्र्या अह्न आसीत्प्रकेतः।
अनीद वातं स्वधया तदेकं तस्मादधान्यन्न पर किं च नास ॥
तम आसीत्तमसा गूढमग्रेऽप्रकेतं सलिलं सर्वमा इदं।
तुच्छ्येनाभ्वपिहितं यदासीत्तपसस्तन्महिना जायतैकं॥
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स्वयंभू ने अपनी छाया से पाँच अविद्यायें उत्पन्न कीं - तामिस्र, अंधतामिस्र, तम, मोह और महामोह - तम आसीत्तमसा ... जैसे भागवतकार नासदीय का भाष्य कर रहे हों!
उन्हें अपनी ऐसी तमोमय काया अभिनन्दनीय नहीं लगी तो उसका विसर्जन कर दिये। वह काया क्षुधा और प्यास रूपी रात हुई जिसे उसी से उत्पन्न यक्षों और राक्षसों ने अपना लिया - रात्र्या अह्न आसीत्प्रकेतः!
भूख और प्यास से व्याकुल वे दोनों उन्हें खाने दौड़े। कुछ कह रहे थे कि इसे खा जाओ, तो कुछ - इसकी रक्षा मत करो।
उद्विग्न देव ने उनसे कहा कि तुम सब मेरी प्रजा हो, मुझे न खाओ, मेरी रक्षा करो। (जिन्होंने कहा कि रक्षा न करो, वे राक्षस कहलाये और जिन्होंने कहा कि खा जाओ वे यक्ष कहलाये।)
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भाष्यकारों द्वारा लगाया गया अर्थ राक्षसों के लिये प्रचलित उपपत्ति 'वयं रक्षाम:' से मेल नहीं खाता। अस्तु।
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किसी नये महत कार्य हेतु मंथन में पहले तम और अवांछित ही सामने आते हैं जिन्हें विघ्न कह लीजिये, हलाहल विष कह लीजिये या राक्षस और यक्ष; उनसे पार पाने पर ही अमृत है।
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आगे स्वयंभू ने देवताओं के सृजन के पश्चात अदेव (असुरों) की सृष्टि की जो कामवश उनसे ही मैथुन करने को तत्पर हो उन्हें दौड़ा लिये।
घबराये स्वयंभू हरि की शरण में गये और उनकी बात मान कर तन छोड़ दिये जोकि अतीव सुंदरी में परिवर्तित हो गया।
भागवतकार उस सौंदर्य की प्रशंसा में जैसे सामुद्रिक शास्त्र उठा लेते हैं:
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तां क्वणच्चरणाम्भोजां मदविह्वललोचनाम् ।
काञ्चीकलापविलसद्दुकूलच्छन्नरोधसम् ॥ ०३.२०.०२९ ॥
अन्योन्यश्लेषयोत्तुङ्ग निरन्तरपयोधराम् ।
सुनासां सुद्विजां स्निग्ध हासलीलावलोकनाम् ॥ ०३.२०.०३० ॥
गूहन्तीं व्रीडयात्मानं नीलालकवरूथिनीम् ।
उपलभ्यासुरा धर्म सर्वे सम्मुमुहुः स्त्रियम् ॥ ०३.२०.०३१ ॥
अहो रूपमहो धैर्यमहो अस्या नवं वयः ।
मध्ये कामयमानानामकामेव विसर्पति ॥ ०३.२०.०३२ ॥
वितर्कयन्तो बहुधा तां सन्ध्यां प्रमदाकृतिम् ।
अभिसम्भाव्य विश्रम्भात्पर्यपृच्छन् कुमेधसः ॥ ०३.२०.०३३ ॥
कासि कस्यासि रम्भोरु को वार्थस्तेऽत्र भामिनि ।
रूपद्रविणपण्येन दुर्भगान्नो विबाधसे ॥ ०३.२०.०३४ ॥
या वा काचित्त्वमबले दिष्ट्या सन्दर्शनं तव ।
उत्सुनोषीक्षमाणानां कन्दुकक्रीडया मनः ॥ ०३.२०.०३५ ॥
नैकत्र ते जयति शालिनि पादपद्मं घ्नन्त्या मुहुः करतलेन पतत्पतङ्गम् ।
मध्यं विषीदति बृहत्स्तनभारभीतं शान्तेव दृष्टिरमला सुशिखासमूहः ॥ ०३.२०.०३६ ॥*
इति सायन्तनीं सन्ध्यामसुराः प्रमदायतीम् ।
प्रलोभयन्तीं जगृहुर्मत्वा मूढधियः स्त्रियम् ॥ ०३.२०.०३७ ॥
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आप में से कितनों ने उषा सूक्त पढ़ा है? ऋग्वेद का वह सूक्त अपने अद्भुत सौंदर्य के लिये जगविख्यात है। यहाँ संक्रमण में ब्रह्मा की देह पहले रात होती है और आगे परम रूपवती संध्या। वैदिक प्रभाव स्पष्ट है।
उस संध्या के सौंदर्य से मूढधिय (गधे के समान बुद्धि वाले) असुर इतने मुग्ध हुये कि उसे स्त्री समझ ग्रहण किये।
सौंदर्य सौंदर्य में अंतर होता है, जो भेद नहीं जानते वे असुरों के समान ही मूढ़ होते हैं।

आगे स्वयंभू ने बारम्बार देह धारण और त्याग कर, भिन्न भिन्न भूतों की सृष्टि की।
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स किन्नरान् किम्पुरुषान् प्रत्यात्म्येनासृजत्प्रभुः ।
मानयन्नात्मनात्मानमात्माभासं विलोकयन् ॥ ०३.२०.०४५ ॥
ते तु तज्जगृहू रूपं त्यक्तं यत्परमेष्ठिना ।
मिथुनीभूय गायन्तस्तमेवोषसि कर्मभिः ॥ ०३.२०.०४६ ॥
पानी में अपनी छवि देख मुग्ध हुये स्वयंभू ने स्वयं से ही किम्पुरुष और किन्नरों की उत्पत्ति की जो उषाकाल में दम्पतिरूप ले उनका स्तुतिगान करते हैं।
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स आत्मानं मन्यमानः कृतकृत्यमिवात्मभूः ।
तदा मनून् ससर्जान्ते मनसा लोकभावनान् ॥ ०३.२०.०४९ ॥

मनुष्यों की सृष्टि कब की?
संतुष्ट स्थिति में स्वयं को कृतकृत्य मानते हुये अपने मन से 'लोककल्याणकारी' मनुओं (मनुष्यों) की सृष्टि की।
मनुष्य के ऊपर समस्त प्राणियों के कल्याण का दायित्त्व है।
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मनुष्य को आदर्श भी तो चाहिये।
तपसा विद्यया युक्तो योगेन सुसमाधिना ।
ऋषीनृषिर्हृषीकेशः ससर्जाभिमताः प्रजाः ॥ ०३.२०.०५२ ॥
तेभ्यश्चैकैकशः स्वस्य देहस्यांशमदादजः ।
यत्तत्समाधियोगर्द्धि तपोविद्याविरक्तिमत् ॥ ०३.२०.०५३ ॥

स्वयंभू ने तप, विद्या, योग, सुसमाधि से युक्त होकर अपनी इंद्रियों को नियंत्रण में कर ऋषियों की सृष्टि की और उनमें से हर एक को अपनी अब तक बारम्बार रूप ले सृजन और स्वयं का विसर्जन करती उस देह के अंश सौंप दिये जो समाधि, योग, ऋद्धि, तप, विद्या और विरक्ति को धारण किये हुये थी। काय प्रयोग न कर देह शब्द का प्रयोग महत्त्वपूर्ण है जोकि विस्तार से सम्बंधित है।
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सृष्टि के क्रम में हम देखते हैं कि स्वयंभू क्रमश: तम, रज और सत भाव में संक्रमित होते अंतत: मनुष्य और उसके आदर्श ऋषियों की रचना कर काया से मुक्त हो जाते हैं।
इस कथा में मनुष्य और उसके आदर्शों की श्रेष्ठता तो स्पष्ट है ही, अन्य प्राणियों के प्रति उसके दायित्त्व भी संकेतित हैं।
~ तदा मनून् ससर्जान्ते मनसा लोकभावनान् ~
॥हरि ॐ॥