शनिवार, 24 दिसंबर 2016

बलि

'बल्' धातु का पाणिनीय अर्थ है प्राणने। 'प्राण' श्वास है। श्वास जीवन है। जीवन अर्थात शक्ति। बल का अर्थ शक्ति इस कारण हुआ। श्वास को नियमन द्वारा उच्च आयाम प्रदान करना प्राणायाम है। बैल बलीवर्द है, क्यों? क्यों कि वह महत कार्य करने हेतु प्राणवान है, समर्थ है। 
बल् धातु से ही बलि बनती है - बलिः [बल्-इन्]। बलि क्या है? अर्पण है, दान है। किसका? प्राण का। माध्यम ऐसी वस्तु हो जो प्राप्तकर्ता को प्राणवान बनाये, पुष्ट करे। दान की अवधारणा ही भावना से जुड़ी है। देने वाले के भीतर  प्राण समर्पित करने का भाव होना चाहिये। समर्पण भाव कृतज्ञता से जुड़ कर पवित्रता और ऐश्वर्य का वाहक बनता है। यहीं बलि यज्ञ का रूप ले लेती है। यजन् जोड़ने से सम्बन्धित है। समर्पित करने वाला और प्राप्त करने वाला दोनों एक उदात्त भाव से जुड़ें तो यज्ञ है। पञ्चमहायज्ञों में दैनिक भूतयज्ञ भी सम्मिलित है। वह क्या है? अन्न ग्रहण करने के पहले सभी भूतों अर्थात जीवधारियों के लिये उनका अंश निकाल देना भूतयज्ञ है। गइया का कौरा, चींटी का दाना, कौवे की रोटी, अतिथि का भोजन, ये सब स्वयं के प्राण को पुष्ट करने वाले अन्न का ग्रहण करने से पहले करना होता है। यह समूचे विश्व का ध्यान रखने वाला बलिवैश्व है। घरनी की रसोई भी बलि का स्थान है। राजा को दिया जाने वाला कर भी बलि है क्यों कि वह राजा प्रजा दोनों को प्राणवान करता है किंतु वही कराधान विकृत लिप्सा भाव से चलित होने पर हंता बन जाता है। 
यदि आप यज्ञ और बलि के आङ्ग्ल अनुवाद देखेंगे तो sacrifice भी मिलेगा। चौंकिये नहीं, यह sacra धातु से बना है जिसका सम्बन्ध देवता के आगे पवित्र समर्पण से है।
यह तो स्पष्ट हो गया होगा कि बलि क्या है? किंतु अब बलि का अर्थ पशु वध ही लिया जाने लगा है। ऐसा क्यों है? जब आप किसी व्यवहार का बारम्बार निषेध करने लगते हैं तो वह निषिद्ध आचरण रूढ़ अर्थ ले शब्द के साथ जुड़ जाता है। यदि साथ में अन्य आचारों का विलोप हो तो रूढ़ि और पक्की हो जाती है। बलि के साथ यही हुआ। कितने जन प्रतिदिन बलिवैश्व कर्म करते हैं? वह भी बस करने के लिये नहीं, यज्ञ और पुष्टिदायी समर्पण भाव के साथ? उत्तर स्पष्ट है।
देव को अर्पण के लिये आहार योग्य पशुओं का वध बहुत पुराना है जिसका सम्बन्ध आखेटचारी जन से है। जो आहार करते, वही देव को अर्पण करते, पूरी निष्ठा और श्रद्धा के साथ। उससे भी बहुत पहले आदिम भय का भाव रहा लेकिन तब भी बलि देते समय जीभ की स्वादेच्छा पूर्ति गौण रही। ध्यान देंगे तो पायेंगे कि इन पशुओं की पूजा भी की जाती रही और सामान्यतया भी उनके साथ व्यवहार बहुत स्नेहिल रहा। देव अर्पण हेतु वध करते समय जिह्वा का स्वाद नहीं, श्रद्धा निर्देशित करती रही। ऐसा अर्पण आराधक और आराध्य दोनों को पुष्ट करता है। इसे ही कहते हैं कि देवता मनुष्य की हवि पा तुष्ट और पुष्ट होते हैं।
वैदिक पद्धति के समांतर समकालीन ऐसी पद्धतियाँ रहीं किंतु दूध दही, मधु, कन्द, मूल, फल, उन्नत कृषि से उत्पन्न अन्न का आहार करने वाले वैदिक जन के लिये बलि हेतु पशु का वध त्याज्य ही रहा। पूरा वैदिक वाङ्मय पशु वध के निषेध से भरा पड़ा है। कई लोग पुराने शब्दों के पशु वध सम्बन्धित अर्थ निकालते हुये तर्क देते हैं। वे भूल जाते हैं कि उत्कृष्ट सांगीतिक छन्दों के सम्पूर्ण दीर्घजीवी तंत्र हेतु जो उन्नत सभ्यता चाहिये होगी, वह कृषि व्यापार में भी बहुत आगे होगी। ऐसा भारत के नदी जल पूरित समतल क्षेत्र में ही सम्भव है। ऐसे रचनाकर्म हेतु ठहराव आवश्यक है जो पशुचारी समाज या बीहड़ क्षेत्रचारी जन के लिये सम्भव नहीं है। ऋषि आश्रमों के अनगिनत उल्लेख और उनके प्रमुख केन्द्र होने के तथ्य सब कुछ स्थापित और स्पष्ट कर देते हैं।

समतल, उपजाऊ और जलसमृद्ध क्षेत्र में विकसित सभ्यता शाकाहार की ओर ही प्रवृत्त होती है। यहाँ जो मांसाहारी हैं, वे प्रतिदिन दोनों समय मांसाहार नहीं करते। पशु वध त्याज्य होने के पीछे उसका क्रन्दन है, रक्त की वह धार है जो अपनी धमनियों में भी दिखती है। एक सुस्थापित व्यवस्था के पुरोहित और यजमान के लिये पशुबलि के समय समर्पण और प्राणपोषण का भाव रखना सम्भव ही नहीं। बलिदान का 'दान' ही उस निषेध के नेपथ्य में है।
तो क्या पशुबलि न दें? ऊपर जो भी कहा वह निगम का पथ है। सहस्रो वर्ष की अपनी यात्रा में सनातन ने आगम अर्थात इतर मार्ग भी स्वीकारे हैं। शाक्त और तंत्र भी उनमें हैं जो प्रभावी रहे और आज भी हैं। मास के साथ मांस भी उनके अनुयायियों के लिये अन्न है। उसका अर्पण यदि वे देवी को करते हैं तो उसके पीछे जो भाव रहते हैं वही महत्त्वपूर्ण हैं। उच्च भाव रखने वाले प्रतिदिन पशुबलि नहीं देते, कतिपय अनुष्ठानों में देते हैं। वे मांसाहारी भी प्रतिदिन मांसाहार करने वाले नहीं हैं। उनके प्रति या उनकी उपासना पद्धति के प्रति तिरस्कार का भाव विनाशक होगा क्यों कि वह जोड़ने वाला यजन् नहीं तोड़ने वाला भंजन होगा।
पशुबलि का निषेध और शाकाहार ये दो समतल भूमि पर संतुलन के साथ रहते जन के लिये आदर्श हैं। आदर्श का प्रसार होना ही चाहिये, उसकी प्राप्ति के लिये तप भी होने चाहिये किंतु अतिरेकी हो अपने ही समाज के पैर पर कुल्हाड़ा चलाया जाना भी रोका जाना चाहिये। जन रहेंगे, संगठित और बली रहेंगे तो देव और देवता भी रहेंगे, आस्था और जीवनमूल्य भी बचे रहेंगे अन्यथा रक्त देखते ही वमन करने वाले कोमल जन के लिये बर्बर रक्तपिपासु शत्रुओं के आगे घुटने टेक आत्महत्या ही परिणति होगी। 

सोमवार, 5 दिसंबर 2016

रामायण : अतिथि का आश्वासन

विराध वध के पश्चात श्रीराम ने सीता जी को हृदय से लगा कर आश्वस्त किया - परिष्वज्य समाश्वास्य और लक्ष्मण से कहा कि यह वन दुर्गम कष्ट भरा है और हम लोग भी अभ्यस्त वनचारी नहीं हैं, शीघ्र ही तपोधन शरभङ्ग के पास पहुँचना होगा।
कष्टम् वनम् इदम् दुर्गम् न च स्मो वन गोचराः
अभिगच्छामहे शीघ्रम् शरभङ्गम् तपो धनम्

अरण्यकाण्ड को पढ़ेंगे तो साफ लगेगा कि जैसे किसी योजना के अंतर्गत राम कड़ी से कड़ी जोड़ते बढ़ रहे हैं! शरभङ्ग के यहाँ पहुँचने से पहले ही दूर से दिव्य इन्द्र समस्त देवताओं के साथ दिखते हैं। विचित्र घटित होता है, इन्द्र खिसक लेते हैं!
इह उपयाति असौ रामो यावन् माम् न अभिभाषते
निष्ठाम् नयत तावत् तु ततो मा द्रष्टुम् अर्हति
जितवन्तम् कृतार्थम् हि तदा अहम् अचिराद् इमम्
कर्म हि अनेन कर्तव्यम् महत् अन्यैः सुदुष्करम्
 देखो, राम आ रहे हैं। इससे पहले कि वह मुझसे संवादित हों उन्हें आप उनके कर्तव्य की ओर प्रेरित करें। उनके ऊपर एक दुष्कर और महान कार्य का दायित्त्व है, जब पूरा कर लेंगे तब मैं उनसे मिलूँगा।
राम शरभङ्ग से पूछते हैं - शक्र अर्थात इन्द्र के आने का क्या प्रयोजन था? शरभङ्ग उत्तर देते हैं - मुझे मेरा तपस्या का फल दे ब्रह्मलोक ले जाने के लिये आये थे लेकिन मैंने आप का आगमन जान स्थगित कर दिया कि बिना आप जैसे 'प्रिय अतिथि' के दर्शन के मैं प्रस्थान नहीं करूँगा!
 इसके पश्चात वह घटता है जिसे फल समर्पण कहा गया। जिसे लोक में ऐसे कहते हैं कि देवता आराधक द्वारा पुष्ट होते हैं। जिसे आधुनिक समझ से यह कहा जाता है - मनुष्य ईश्वर का विधाता है। आप के देव की शक्ति आप की शक्ति के अनुक्रमानुपाती होती हैशरभङ्ग कहते हैं:
अक्षया नरशार्दूल जिता लोका मया शुभा:
ब्राह्मयाः च नाक पृष्ठ्याः च प्रतिगृह्णीष्व मामकान्
हे पुरुषसिंह! मैंने अक्षय और शुभ लोक जीत लिये हैं। वे ब्रह्मलोक और स्वर्गलोक (नाक - हाथी, पृष्ठ - पीठ अर्थात उसका लोक जो हाथी की पीठ पर बैठता है अर्थात इन्द्र का स्वर्ग लोक) मुझसे आप स्वीकृत करें।
रामकथा दर्शाती है कि कैसे विश्वामित्र, जामदग्नेय राम, अगस्त्य, शरभङ्ग आदि उस युग के बुद्धिजीवियों ने अपने समस्त तप का अर्पण मानवता के योद्धा श्रीराम को कर दिया था। सभी भौतिक योद्धा नहीं होते, बहुत बड़ी पात्रता चाहिये होती है किंतु योद्धा पहचान में आ गया तो उसे बली तो कर ही सकते हैं, उसे उत्प्रेरित कर सकते हैं और मनस्वी तो तैयार भी कर सकते हैं। इस युग के बुद्धिजीवी कहाँ लिप्त हैं, ध्यान दीजिये, समझ में आ जायेगा कि समस्या की जड़ कहाँ है!
 राम विचित्र उत्तर देते हैं:
अहम् एव आहरिष्यामि सर्वान् लोकान् महामुने
आवासम् तु अहम् इच्छामि प्रदिष्टम् इह कानने

महामुनि! मैं ही आप को उन सभी लोकों की प्राप्ति कराऊँगा या महामुनि! केवल मैं ही उन लोकों को ग्रहण करूँगा लेकिन अभी तो इस कानन में आवास निर्माण करना है, मुझे निर्दिष्ट कीजिये।
वह सब तो ठीक है लेकिन हमलोग रहें कहाँ, यह तो बताइये? शरभङ्ग क्या करते हैं? राम को सुतीक्ष्ण मुनि की राह बता हैं जैसे कोई अनूठी छड़ी दौड़ हो, धावक एक, कई ठाँव। दौड़ो राम!
तत्पश्चात कहते हैं - मुहुर्त भर, दो घड़ी मुझे देखो राम! जब तक कि मैं इस जीर्ण देह का त्याग न कर लूँ!

 मुनि अग्नि की स्थापना कर अग्नि में प्रवेश कर गये। वाल्मीकि जी ने लिखा - समाधाय हुत्वा मंत्रवत। देह नहीं समिधा है, जैसे मंत्र पढ़ कर  हवन कर दी गयी हो।  कितनी गहरी प्रतीक्षा रही होगी, कितनी पीड़ा, कितने कष्टों और अत्याचारों को सहते शरभङ्ग तपे होंगे कि अवतार को उसकी प्रतिज्ञा के प्रति सुदृढ़ करने के लिये आत्मदाह से अधिक कोई युक्ति सूझी ही नहीं!
इस अग्निमय प्रस्तावना के साथ राम की दीक्षा का पाठ प्रारम्भ होता है, रक्षा हेतु प्रार्थना के बहाने राम से आश्वासन ले लिया जाता है:
मेsयं वने वासो भविष्यतो महाफल:,
तपस्विनां रणे शत्रुन् हंतुमिच्छामि राक्षसान्
(निशिचर हीन करौं मही)।

कितने प्रकार के तपस्वियों ने यह आश्वासन लिया?
वैखानसा वालखिल्याः संप्रक्षाला मरीचिपाः
अश्म कुट्टाः च बहवः पत्र आहाराः च तापसाः
दन्त उलूखलिनः च एव तथा एव उन्मज्जकाः परे
गात्र शय्या अशय्याः च तथा एव अनवकाशिकाः
मुनयः सलिल आहारा वायु भक्षाः तथा अपरे
आकाश निलयाः च एव तथा स्थण्डिल शायिनः
तथा ऊर्ध्व वासिनः दान्ताः तथा आर्द्र पट वाससः
स जपाः च तपो नित्याः तथा पंच तपोऽन्विताः
जैसे वाल्मीकि वनस्पतियों को बताते हैं, जैसे ऋतुवर्णन में वर्णन की झड़ी लगा देते हैं वैसे ही इन श्लोकों में जितने तरह के तापस हो सकते हैं, समेट दिये हैं - वैदिक वैखानस और वालखिल्य, अगले समय के आहार के लिये कुछ भी सहेज कर न रखने वाले, सूर्य किरणों का पान करने वाले, अन्न को बस पत्थर से कूट खा जीने वाले, पत्ते खा कर रहने वाले, दाँतों से ही ऊखल का काम लेने वाले अर्थात बिना कूटे ही अन्न ग्रहण करने वाले, कंठ तक पानी में निमग्न रह तप करने वाले, देह को ही बिछौना मानने वाले अर्थात धरा पर बिना आभरण के सोने वाले, बिना शय्या के रहने वाले अर्थात न सोने वाले, सत्कर्म में निरंतर लगे रह कभी अवकाश न लेने वाले, जल पीकर रहने वाले, वायु पी कर रहने वाले, आकाश के नीचे खुले में विचरने वाले, वेदी पर सोने वाले, पर्वतों पर रमने वाले, सदा भीगे वस्त्र धारण करने वाले, जपी, नित्य तपी और पंचाग्नि अर्थात चार ओर से अग्नि और ऊपर से धूप का सेवन करने वाले।

... ऋग्वेद में भी ढेर सारे भिन्न चर्या वालों के उल्लेख हैं। मतभिन्नता के साथ साहचर्य यहाँ की विशेषता रही है। चूँकि लेखन, काव्य और श्रुति परम्परा सबके पास नहीं थी या सभी उस ओर ध्यान भी नहीं देते थे इसलिये भिन्न धारा द्वारा वर्णन में सूचना का अभाव साफ दिखता है। नाम गिना कर काम चला लिया जाता है। ध्यान से देखें तो इनमें चेतना और कर्म की भिन्न भिन्न स्थितियों के संकेत भी मिलते हैं।
यह धारा अक्षुण्ण चली आ रही है। उपनिषदों ने वर्णित किया, बुद्ध ने बताया, जैनियों ने जिया, अलक्षेन्द्र को भी बैखानस तापस मिले, गुप्त काल, वर्धन काल, राजपूत काल ...
... हर काल में यह प्रवाहित है और उसके साथ यह आदर्श भी कि इनकी और प्रजा की रक्षा क्षात्र धर्म है।